नवनीता देव सेन बांग्ला की सर्वाधिक चर्चित लेखिकाओं में से हैं. 65 वर्षीया नवनीता के लेखन का विस्तार बाल साहित्य, हास्य, गल्प, कविता से लेकर आलोचना और आत्मकथात्मक निबंधों तक जाता है. जादवपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरांत उन्होंने हार्वर्ड, कैम्ब्रिज और बर्कले विश्वविद्यालयों से भी शिक्षा पाई है. उनकी सर्वाधिक मौलिक कृतियों में से ‘स्टडी ऑफ वूमेनस रिटेलिंग ऑफ रामायणा’ है. उन्हें कई महत्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हुए हैं. हाल में नयी दिल्ली में हुए यूर्केदक्षिण एशियाई लेखिका सम्मेलनः 2003 में उन्होंने भाग लिया. यह साक्षात्कार इसी सम्मेलन के संदर्भ में लिया गया है.यह साक्षात्कार का दूसरा व अंतिम हिस्सा है.यह नई दिल्ली में राजेश रंजन से हुई बातचीत पर आधारित है जिसका पहला हिस्सा “इतिहास, समाजशास्त्र और साहित्य की रिक्तताओं को भर रही हैं लेखिकाएँ – नवनीता देव सेन” है.


navnita dev sen

नवनीता देव सेन

सभी आधुनिक लड़कियाँ एक जैसी पोशाकें पहनती हैं. हमारे यहाँ, आप कर्नाटक जाइए… अलग किस्म की साड़ी पाएँगे…तमिलनाडु में दूसरे प्रकार की साड़ी… केरल मे पूर्णतः अलग दृश्य…कोंकणीभाषी क्षेत्र में दूसरा दृश्य… गुजरात में अलग ही. राजस्थान जाइए, तीसरा. इतने सारे रंग, इतनी चमक, इतनी विविधता, समृद्धि फिर बंगाल आ जाइए. पर अब शहरों में जाइए आप पाएँगे एक सी पोशाकें, एक से पहनावे के तरीके, एक से चेहरे, यह बहुत उबाऊ है. भूमण्डलीकरण ने युवा भारतीयों को उबाऊ दिखने वाला बना दिया है. बहुत से निर्धन लोग पहले स्थानीय रूप से बने कपड़े पहनते थे. उड़ीसा में, तमिलनाडु में, वे स्थानीय, बुने हुए कपड़े पहनते थे. अब देखकर दिल टूट जाता है कि हमारे सभी स्थानीय रूप से बुने हुए वस्त्र गायब हो रहे हैं. फैशनेबल नहीं रहे. अब एथनिक कहलाते हैं और बड़े शहरों में सेल लगाया जाता है और अब ये धनी महिलाओं के लिए पार्टी वियर के रूप में रह गए हैं उन एनजीओ वालियों के बीच.


आपने अपने एक निबन्ध में कहा है कि ‘रामायण’ में स्त्रियों द्वारा गाए लोकगीत मुख्यतः छह विषयों पर आधारित हैं – शिशु जन्म, विवाह, अपहरण, गर्भावस्था, परित्यक्तावस्था, संतानोत्पत्ति. क्या ये वही सीमाएँ नहीं हैं, जिनके अन्तर्गत पुरूष स्त्रियों को सीमित रखना चाहते हैं?

मैं सिर्फ ये कहना चाहती थी कि मूल लेख में 12 टॉपिक थे. और ये एक उसका छोटा संक्षिप्त रूप है. लेकिन मूल लेख में 12 थे और ज्यादा भी हो सकते हैं. मैं नहीं कह रही हूँ कि सिर्फ “12″. नहीं, नहीं. आप इन्हें घटाकर 12 पर ला सकते हैं. कई अन्य विषय भी हो सकते हैं. ये ऐसे विषय हैं जो पुरूषों द्वारा नहीं उठाए गए. पुरूष इन क्षेत्रों को सामान्यतः अपने महाकाव्यों में नहीं छूते. ‘रामायण’, ‘महाभारत’ जैसे विशाल महाकाव्यों में ऐसे विषय पुरूषों द्वारा नहीं छूए गए, क्योंकि उनके पास दूसरे, ज्यादा दिलचस्प विषय थे – युद्ध, राजनीति, सत्ता पलट, राजनैतिक चालें, युद्ध से विलग शक्ति की राजनीति. वह तो महत्त्वपूर्ण अंश हैं इन महाकाव्यों का. और यह भी कि महिलाएँ इन महाकाव्यों की परिधि पर भी नहीं हैं, उनका दूसरा पहलू नहीं है. वे केंद्रीय सिर्फ इसलिए हैं, कि युद्ध उनके परितः हुआ है – द्रौपदी की तरह. अतः वे केवल निमित्त हैं, उत्प्रेरक हैं. वे युद्ध आरंभ करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं. द्रौपदी स्वयं में कारण नहीं है. वह राजनैतिक योजना की शिकार हुई है. ऐसा ही ‘रामायण’ में भी है. दूसरी जगहों पर भी ऐसा ही है.

हम संस्कृतियों के पार एक दूसरे के कितने करीब हैं – अपने साझा अनुभवों के कारण. बहुत ज्यादा, इसमें कि हम क्या खोते हैं, कितने यातनाग्रस्त होते हैं, क्या हमारी इच्छाएं-आकांक्षाएँ बेहद समान हैं. यह स्तब्धकारी, चौंकाने वाला नहीं क्योंकि यह सब एक ही संस्कृति से निकला है. एक ही इतिहास से. और यह पितृसत्तात्मक इतिहास रहा है. एक ऐसा समाज रहा है जो पुरूषों के द्वारा चलाया जाता रहा है, उनकी निरंकुश सत्ता के अधीन रहा है. और महिलाएँ इसमें डाल दी गई हैं-राजी-खुशी नहीं. क्योंकि उनका पक्ष स्पष्ट नहीं किया गया है इन गीतों में महिलाएँ उन चीजों के बारे में गाती हैं, जिनका जिक्रि महाकाव्य नहीं करते. मैंने ये नहीं कहा कि सिर्फ ये ही चीजें है. और भी बहुत सी चीजें हैं जिनके बारे में वे गीत गाती हैं. मगर ये ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में वे अधिकांशतः गाती हैं. क्योंकि ये चीजें उनके जीवन की हैं. और भी बहुत सी चीजें हैं – जैसे विवाह, रोमांस. बहुत सी सकारात्मक चीजें जैसे – प्रेम और रोमांस और खुशहाली, वह इस लेख में नहीं क्योंकि वह उसका विषय नहीं है.

आपने विदेशों में भी शिक्षा पाई है. क्या आप मानती हैं कि ताजा भूमण्डलीकरण में, भूमण्डलीकरण आंग्ल-अमरीकी का पर्याय हो गया है? क्या इस लहर में स्थानीयता सुरक्षित रह पाएगी? स्त्रियां इस वैश्वीकरण में कहां हैं?

स्त्रियों की स्थिति “इस मामलें में” पुरूषों की स्थिति से बहुत भिन्न नहीं है. सभी एक ऐसा पद प्राप्त करने की होड़ में हैं जिसकी वे काबिलियत रखते हैं. स्त्रियाँ जब आप स्त्रियों की बात करते हैं तो उन 90 प्रतिशत की करनी होगी, जो आंग्ल-अमरीकी भूमंडलीकरण से उस तरह प्रभावित नहीं हुई हैं. सिर्फ वे प्रभावित हुई हैं, जो शहरों में हैं. स्त्रियों को मीलों तक सिर पर पानी ढोना पड़ता हैं और ग्लोबलाइजेशन के बारे में उतना ही जानती हैं, जितना वह टी.वी. पर आता है. और तब बहुत सी चीजों की आकांक्षा उनमें पैदा हो जाती है. उनकी इच्छाएँ बहुत-सी हैं पर उन्हें पूरा करने की उनकी क्षमता नहीं है. मैं नहीं जानती कि ग्रामीण स्त्री को भूमंडलीकरण ने कहाँ तक प्रभावित किया है. जब हम स्त्री की बात करते हैं, तो हम शहर की स्त्रियाँ समझ लेते हैं. ये ही वो महिलाएँ हैं, जिन्हें आंग्ल-अमरीकी भूमण्डलीकरण ने प्रभावित किया है और उनकी पोशाकें, पहनावे बदल गए हैं. और यह देखना बेहद दुःखद है कि जो खूबसूरत पोशाकें भारतीय स्त्रियाँ परंपरा से पहनती आई हैं – साड़ियाँ, लहंगे, चोलियाँ लुप्त हो रही हैं. महिलाओं ने पाश्चात्य पोशाकें अपना ली हैं. उसी तरह जिस तरह 200 साल पहले पुरूषों ने अपनाई थीं. यह दुःखद बात है.

लेकिन साड़ी जैसा पारंपरिक पहनावा आज की भाग-दौड़ की जिंदगी में उपयुक्त है क्या?

मैं समझती हूँ कि साड़ी पहनकर प्रसन्नता अनुभव करना सम्भव है. हमारे समय में हम साड़ियाँ पहनकर साइकिल चलाती थीं. बसों मे लटकती थीं. हमें कभी कोई समस्या नहीं हुई. पर चलो, हम मान लेते हैं कि अब यह सम्भव नहीं, कठिनाई है इसमें जो भी हो मैं समझती हूँ कि कपड़े बदल गए हैं बाल गायब हो गए हैं. “हँसती हैं” लम्बे खूबसूरत जो बाल कभी हुआ करते थे लुक्स बदल गए हैं, ग्लोबलाइजेशन के कारण, मैं समझती हूँ. और बहुत सारे बाह्य परिवर्तन आए हैं महिलाओं में, जैसे महिलाओं में धूम्रपान, मद्‌यपान आदि. गाँव में तो स्त्रियां हमेशा से धूम्रपान करती आई हैं. श्रमिक वर्गों की महिलाएँ हमेशा से मदिरापान करती रही हैं. लेकिन मध्यवर्ग में ऐसा नहीं था. इस तरह से मध्यवर्ग बदल गया है.

हालांकि ये छोटी बातें हैं ये बड़ी बातों में बदल जा सकती हैं. मैंने कहा कि मैं इन छोटी चीजों पर कभी गौर नहीं करती, लेकिन ये परिवार का सन्तुलन थोड़ा बदलती हैं. लेकिन सिर्फ यह सब करने से आप आधुनिक महिला नहीं हो जातीं. आधुनिक स्त्री की पहचान कहीं आपके भीतर स्थित है, आपके सोचने के तरीके में, आपके क्रियान्वयन के तरीके में, सिर्फ नकलची “‘copy cat’” बनने में नहीं. और वे ये चीजें करती है, जो कि सबसे आसान चीजें हैं. ये आपको वास्तव में एक मुक्त “emancipated” स्त्री नहीं बनातीं. मुक्ति तो आपके भीतर थोड़ी गहराई में स्थित होती है, आपकी मूल्य प्रणाली में. इन मामूली चीजों में नहीं. इसमें कि कैसे आप अपने जीवन की किसी समस्या से निबटती हैं, कैसे आप तय करती हैं कि आपके लिए क्या महत्त्वपूर्ण है, क्या हानिकारक है और क्या हानिरहित है. ये ही चीजें अंततः बदल जाएंगी, मुझे आशा है. फिलहाल तो बाहरी मामूली चीजें ही मुक्ति के पहचानचिन्ह के रूप में देखी जा रही हैं. पहले भी, पश्चिम में, ऐसा हुआ है. जब उनके यहां मुक्ति आंदोलन आया, उन्होंने धूम्रपान शुरू किया. क्योंकि नई चीज थी. स्वाभाविक है, हमारे देश में भी हुआ है. पर, पुनः यह फैशनेबल रह नहीं जाएगी. धूम्रपान अस्वास्थ्यकर है. जब हम मुक्ति की ओर थोड़ा और अग्रसर होंगे, कई लोग इसे छोड़ देंगे. तब आपको पता लगेगा कि यह आपके लिए, आपके बच्चों के लिए धूम्रपान बुरा है. यह जानने के लिए कि यह बुरा है, थोड़े और परिष्कार की जरूरत है. पहला चरण है -धूम्रपान करना और दूसरा जब आप आगे गए, आप छोड़ देते हैं. (हँसती हैं)

मैं समझती हूँ स्त्री और पुरूष दोनों ही – मुझे यह बोलने में सकुचाहट होती है पर – आसान धनप्राप्ति की ओर भाग रहे हैं. और हमारी सरकारें भी लॉटरियाँ चलाकर हमारी सहायता कर रही हैं. और उपभोक्तावाद जो भूमंडलीकरण का मुख्य लक्षण है, ने सचमुच हमें हानि पहुँचाई है. हम बड़े लालची हो गए हैं और लोभ के कारण ही बहुत सा भ्रष्टाचार फैल रहा है. मैंने एक दिन अखबार में पढ़ा कि कॉलेज की लड़कियाँ कॉलगर्लों के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं क्योंकि वे जेब खर्च चाहती हैं. कलकत्ते में पढ़ा कि स्कूली लड़कियाँ, धनी घरों की, कॉलगर्लों के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं. क्योंकि वे और ज्यादा जेबखर्च चाहती हैं. डिस्को जाने के लिए, मजे के लिए और ये सब हो रहा है- भूमण्डलीकरण का काला पक्ष. लेकिन इसका उजला पक्ष भी है.

लेकिन इसका काला पक्ष काफी खतरनाक हो सकता है.

हमारी इच्छाएँ विस्तारित हो रही हैं पर हमारे बाजू उतने लम्बे नहीं हैं यह कठिनाई है. महिलाओं की यातना बढ़ रही है. पुरूष-स्त्री सभी इस ट्रैप में फँस रहे हैं. हमें इस जाल से बाहर निकलना होगा. लेकिन हम कुछ करते नहीं. पश्चिम में बहुत पहले ही भूमंडलीकरण-विरोधी आंदोलन, उपभोक्तावाद विरोधी आंदोलन शुरू हो गया था. पुनः महिलाओं ने ही इसे आरंभ किया, क्योंकि उन्होंने ही इसका दबाव महसूस किया. हमलोगों ने अबतक नहीं सीखा. हमें घर पर इसका दबाव महसूस करना होगा, इसके खिलाफ नियोजित युद्ध लड़ने के लिए. लेकिन जिस चीज ने मुझे ज्यादा आहत किया है, वह यह है कि इसने हमारी संस्कृति का समांगीकरण किया है. भूमंडलीकरण शहरों में समांगीकरण कर रहा है. भारतीय नगरीय संस्कृति का. सभी आधुनिक लड़कियाँ एक जैसी पोशाकें पहनती हैं. हमारे यहाँ, आप कर्नाटक जाइए… अलग किस्म की साड़ी पाएँगे…तमिलनाडु में दूसरे प्रकार की साड़ी… केरल मे पूर्णतः अलग दृश्य…कोंकणीभाषी क्षेत्र में दूसरा दृश्य… गुजरात में अलग ही. राजस्थान जाइए, तीसरा. इतने सारे रंग, इतनी चमक, इतनी विविधता, समृद्धि फिर बंगाल आ जाइए. पर अब शहरों में जाइए आप पाएँगे एक सी पोशाकें, एक से पहनावे के तरीके, एक से चेहरे, यह बहुत उबाऊ है. भूमण्डलीकरण ने युवा भारतीयों को उबाऊ दिखने वाला बना दिया है. बहुत से निर्धन लोग पहले स्थानीय रूप से बने कपड़े पहनते थे. उड़ीसा में, तमिलनाडु में, वे स्थानीय, बुने हुए कपड़े पहनते थे. अब देखकर दिल टूट जाता है कि हमारे सभी स्थानीय रूप से बुने हुए वस्त्र गायब हो रहे हैं. फैशनेबल नहीं रहे. अब एथनिक कहलाते हैं और बड़े शहरों में सेल लगाया जाता है और अब ये धनी महिलाओं के लिए पार्टी वियर के रूप में रह गए हैं उन एनजीओ वालियों के बीच (हँसती हैं). और आप गांव जाइए. ग्रामीण महिला आपको भयंकर सी नायलॉन साड़ी पहनी हुई दिखेगी-सस्ती है और आसानी से धुलने वाली. इस तरह भूमण्डलीकरण हमारी संस्कृति को खाता जा रहा है. यह भारतीय नारी का चेहरा बदल रहा है और यह दुःखद है.

भारतीय स्त्री की राजनीति में कोई स्पष्ट सहभागिता आज नहीं है. किसी भी परिवर्तन में राजनीति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. भारतीय नारी की राजनीति में इस अनुपस्थिति के पीछे क्या कारण है?

मैं बड़ी पार्टियों और बड़े राजनैतिक परिदृश्य पर बात नहीं करूंगी. या तो कोई-दिखावटी महिला रखी है या फिर कोई लालची महिला रखी गई है वहाँ. यह सभी पार्टियों ने सोच रखा है-मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहूंगी – आप 5 ऐसी महिलाओं को ले लें एक तमिलनाडु में, एक दिल्ली में, एक यू. पी., एक बंगलौर में इन सबको एक साथ देखें.

इससे एक जुड़ा प्रश्न. जो भी नेता हैं, मान लीजिए मायावती हैं यू. पी. में, राबड़ी देवी बिहार में, फिर भी कोई परिवर्तन क्यों नहीं आता?

देखिए, ये लोग तो हैं. पर क्या ये सचमुच राजनैतिक महिलाएँ हैं? नहींं, ये कठपुतलियाँ हैं. मेरी दिलचस्पी इन महिलाओं में नहीं हैं, क्योंकि ये अपवाद हैं. सबसे पहली बात तो ये है कि, जो मैं सोचती हूं कि ये महिलाओं के लिए कुछ भी नहीं करतीं. क्या हम इनको महिलाओं के लिए कुछ करते हुए देखते हैं? ममता कलकत्ता में है ये सब महिलाएँ हैं, पर ये तो वही ताकत की राजनीति का खेल खेल रही हैं, जो पुरूष खेलते हैं. यहाँ भी वे मर्दों के ही खेल खेल रही हैं. वे लैंगिक रूप से जागरूक नहीं हैं, और वे महिलाओं के लिए काम भी नहीं कर रही हैं. लेकिन मैं यह भी देख रही हूँ कि पश्चिम बंगाल के सुदूर गांवों में महिलाएँ पंचायत प्रधान हैं. मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में महिला सरपंच हैं और बंगाल में पंचायत प्रधान. लेकिन महिलाएँ जिला परिषद्‌ सभापति नहीं हैं. फिर सरपंच पति का मामला है. सरपंच पति जैसा कोई शब्द नहीं हैं, पर वे हैं. आप पाते हैं कि महिलाएँ हैं पर किसी न किसी मर्द के हाथों की कठपुतली हैं.

और ये भी महिलाओं हेतु कार्य नहीं कर रहीं. और यदि कभी आप महिलाओं के लिए काम करने की सोचती हैं, तो आपको इजाजत नहीं मिलती. अब इस दिन मैंने मध्य प्रदेश की एक स्त्री की भयावह कहानी सुनी, वह इस वक्त अस्पताल में है – मृत्यु से लड़ती हुई, 80 प्रतिशत जली हुई. उसने स्वयं पर किरासन उड़ेल लिया. कुछ लोग इसे दुर्घटना बताते हैं कुछ कहते हैं उसने बयान छोड़ा है कि ‘मैंने किरासन उड़ेला क्योंकि मैं कुछ कर ही नहीं सकती. वे मुझे कुछ करने की इजाजत नहीं देते.’ यह सब किया उसने…कुण्ठाग्रस्त होकर.आश्चर्य है. और वह एक दलित महिला है.कितनी खूबसूरत बात है- मैं इसके बारे में लिखना चाहती हूँ. बहुत सी छोटी-छोटी चीजें, छोटे-छोटे परिवर्तन वह करना चाहती थी. उसके बात करने का तरीका. जिस प्रकार लोग उसके बारे में बात करते हैं आप पाएँगे कि वह लड़ नहीं पाई. लोगों ने उसे काम नहीं करने दिया. तो यह ऐसी एक महिला है जो महिलाओं के लिए कुछ करना चाहती है और दलितों के लिए और अंततः वह किसी ने उसे मारा नहीं. वह दरअसल गुस्से से पागल हो गई कि वह वो नहीं कर पाई जो वह करना चाहती थी. यहां एक ऐसी महिला है जिसके पास उसके खुद के विचार हैं. वह काम नहीं कर पाती. वह हमारी सेवा नहीं कर पाती. लेकिन यही हालत है अभी हमारे देश की. यही है कारण जिसके लिए स्त्रियों को अब भी पृथक रूप से लिखने की जरूरत है. यही होता है, जब तृणमूल स्तर पर एक महिला वास्तव में काम करना शुरू करती है, वास्तव में राजनीति में हिस्सा लेती है.

अंग्रेजी लेखन क्यों इतना अलग-थलग है, जबकि देशी साहित्य बाहर से भी समय-समय पर प्रभाव ग्रहण करता रहता है?

मुझे प्रसन्नता है कि आपने यह प्रश्न पूछा है. मैं आजकल इस बात को लेकर बहुत चिंतित हूँ कि जिस प्रकार हमलोग लिख रहे हैं… यदि हम अनूदित नहीं होते हैं तो हम समाप्त हो जाने वाले हैं. भारत के अंग्रेजी लेखक प्रधानतः अपनी प्रविधि पश्चिम से सीखते हैं. भूमंडलीकरण के कारण भी… वे भारतीय भाषा नहीं जानते हैं और वे लिखते भी पश्चिम के लिए ही हैं. मुझे सबके लिए ऐसा नहीं कहना चाहिए. ऐसे अपवाद हैं, जो भारत में लिखते हैं और प्रकाशित होते हैं. समग्रतः मैं समझती हूँ अंग्रेजी में दो प्रकार के भारतीय लेखक हैं – एक तो वे जो विदेशियों के लिए लिखते हैं-आप्रवासी लेखक और वे प्रकाशित भी बाहर ही होते हैं, और उनकी दिलचस्पी उसी में होती है कि बाहर क्या प्रकाशित हो रहा है. अतः इनकी दृष्टि भारत पर नहीं होती, विदेशों में होती है.वे भारतीय सामग्री का उपयोग करते हैं एक्जोटिक सामग्री जो यहाँ उत्पादित हो रही है. ऐसी शिकायत प्रायः सुनने को मिलती है और पूर्णतः गलत भी नहीं-कुछ दम है इनमें.

पर दूसरी ओर अन्य भारतीय अंग्रेजी लेखक भी हैं जो भारतीय अनुभव को अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं.ये भारत में प्रकाशित होते हैं और मुझे पता नहीं विदेशों में इनको कितनी स्वीकृति मिल पा रही है. लेकिन कुछ लेखक ऐसे हैं जो विदेशियों की नकल नहीं कर रहे. पहले के जमाने में हमारे यहाँ महान आर. के. नारायण थे, जो पूरी तरह भारतीय अंग्रेजी लेखक थे. अन्य लेखकों में राजा राव, मुल्कराज आनंद इस पीढ़ी के हैं, जो भारतीयों के लिए लिख रहे थे. मगर अब ग्लोबलाइजेशन के कारण स्थिति बदल गई है और लोग अब वृहत्तर समूह के लिए लिख रहे हैं. लेकिन आज जब मैं अमिताव घोष की बांग्ला में ‘शैडो लाइट्‌स’ पढ़ती हूँ या जब अमित चौधुरी को पढ़ती हूँ, तो यह अंग्रेजी में भी लिखा गया बंगाली पीस मालूम होता है.मगर हमेशा नहीं.

मैं यह भी पूछना चाहता हूँ कि …यदि मैं आपसे पूछूँ तो आप पचासों विदेशी लेखकों के नाम गिनवा सकती हैं, पर यदि अंग्रेजी लेखक से पूछा जाय कि कितने भारतीय लेखकों को आपने पढ़ा है, तो उन्होंने अंग्रेजी लेखकों के अतिरिक्त किसी को भी नहीं पढ़ा है. ऐसा क्यों है?

मैं नहीं जानती क्यूँ. मैं पुनः इसे ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव के रूप में लेना चाहूंगी. यदि आप विश्व नागरिक हैं, तो आप विश्व के लेखकों को पढ़ते हैं. लेकिन भारतीय सीमा के अंदर के लेखक, बहुत बड़ी संख्या में है. पर उनका अनुवाद नहीं होता. तो हम कैसे जानेंगे? उन्हें कैसे पता चलेगा? विश्व उनको नहीं जानता. वे “अंग्रेजी लेखक” विश्व नागरिक ज्यादा है, भारतीय नागरिक कम. उनका प्रशिक्षण अलग तरह से हुआ है. वे विश्व को पहले जानते हैं, भारत को बाद में. हम भारत को पहले जानते हैं, विश्व को बाद में. लेकिन वे नहीं. और नुकसान उनका ही है, मुझे लगता है. और वे भारतीय साहित्य से अनभिज्ञ हैं. मैं यह नहीं कहती कि सब ऐसे हैं. कुछ अपने पृष्ठभूमि विशेष के भारतीय साहित्य से परिचित हैं. लेकिन सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि उनमें से अधिकांश अंग्रेजी में इसलिए लिख रहे हैं कि वे भारतीय भाषा को न तो पढ़ सकते हैं, न लिख सकते हैं. उन्होंने भारतीय साहित्य को नहीं पढ़ा है क्योंकि यह अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं हो पाता.

इसलिए मैं पुन अनुवाद के प्रश्न पर वापस आती हूँ. भारतीय अंग्रेजी लेखक भारतीय साहित्य को ज्यादा पढ़ेंगे यदि वह अंग्रेजी में उपलब्ध होगा, और यदि वह पठनीय होगा. कई बार ऐसे अनुवाद होता है कि मूल भी खराब मालूम होने लगता है. हमें वह पढ़ने का मन नहीं करता और हम इसे समाप्त भी नहीं करते. ऐसा मेरे साथ ही कई बार हो चुका है. अतः यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम उच्चस्तरीय, पठनीय अनुवाद प्रस्तुत करें. जब यह हो जाएगा, अंग्रेजी के लेखक इसे अवश्य पढ़ने लगेंगे, ऐसा मैं मानती हूँ. और क्यों नहीं? वे जो भी पढ़ सकते हैं, पढ़ना चाहते हैं. जो भी पठनीय हो. जो भी लैटिन अमरीकियों द्वारा लिखा जा रहा है, हम स्पैनिश या पुर्तगीज में नहीं पढ़ते. वे अनुवादित होते हैं. और अनूदित सामग्री पठनीय होती है. हम सभी ने ये अनुवाद पढ़े हैं. और मध्य यूरोपीय साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध है.

यह हमारी गलती है कि हम अपने महान्‌ लेखकों को अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं करवाते. यदि हम उन्हें अंग्रेजी में उपलब्ध करा सकें, वे इन्हें पढ़ेगे. कितने उपलब्ध हैं? सिर्फ एक ‘गोदान’, एक ‘तमस’, एक ‘गीतांजलि’, एक ‘हजार चौरासी की मां’ आप देखिए न एक ‘आग का दरिया’ एक लेखक के अनुवाद की मात्र एक प्रति, उस लेखक के अपने एक देश में. और बस यहीं तक. इससे चलेगा? हमें परिश्रम करना होगा और कुशल अनुवादक तैयार करने होंगे. अनुवाद में पैसा नहीं है, इसलिए लोग अनुवाद नहीं करते. प्रकाशकों को फ्रिक्रि नहीं है. हमें अच्छे लेखक चाहिए, लोग जिन्हें अच्छी अंग्रेजी लिखनी आती हो-अनुवाद हेतु. अच्छी अंग्रेजी जानने वाले लोग दूसरी नौकरी करने चले जाएँगे, अनुवाद क्यों करेगे. वे अनुवाद अपने खाली समय में करते हैं. शौक के रूप में अनुवाद करते हैं, प्रोफेशनल के रूप में नहीं. हमें ऐसे अनुवादकों की आवश्यकता है जो प्रोफेशनल्स के रूप में अनुवाद कार्य करेंगे. इसके लिए संस्थाएँ बननी चाहिए. सरकारी व गैर सरकारी संस्थान – जो इन अनुवादकों को वेतन दें तथा वे समयबद्ध सीमा में अनुवाद कार्य प्रस्तुत कर सके. वेतन अच्छा मिले.एक व्यक्ति एक ही लेखक पर काम करे.

इस प्रकार करना चाहिए. हमें यह सीखना होगा कि अनुवाद कैसे करवाया जाए. अनुवाद के प्रति आपको प्रोफेशनल होना होगा. हम यह रोना रोते नहीं रह सकते कि हमको पढ़ा नहीं जा रहा. पढ़ने को है क्या? मुझे बंगला के बारे में कोई शिकायत नहीं है. मैंने अपने बंगला को बहुत अच्छी तरह पढ़ा है. सीमा के दोनों ओर के बंगला को, इस तरफ और बंगलादेश के. क्योंकि मैं इस भाषा को जानती हूँ. जब तक अनुवाद नहीं करते, क्या हो सकता है? हम कह सकते हैं कि हमें तमिलनाडु में नहीं पढ़ा जा रहा. जबतक आप अनुवाद नहीं करते, वे पढ़ेंगे कैसे? और इसलिए एक अंग्रेजी लेखक, जो अंग्रेजी में लिखता है, हो सकता है उसने मुझे न पढ़ा हो, क्योंकि उसे बंगला नहीं आता. मगर मैं शिकायत नहीं कर सकती.