गिर्दा एक फक्कड़ ग्रामीण गवैया थे – शेखर पाठक
शनिवार की शाम जनसंस्कृति मंच की ओर से राजेंद्र भवन (दीन दयाल उपाध्याय मार्ग) में ‘गिर्दा की याद में’ श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत एक मिनट के मौन और माल्यार्पण से हुई. इसके बाद गिर्दा का प्रसिद्ध गीत जैता एक दिन तो आलो… गाया गया.हिमालय के इनसाइक्लोपीडिया और पहाड़ को पैदल चल कर समझने वाले शेखर पाठक ने गिर्दा का जीवन वृत्तांत बताया. भावुक होते हुए उन्होंने जानकारी दी कि उनकी शवयात्रा जैसे कोई ऐतिहासिक यात्रा थी. लोग अपनी रुंदली आवाज में ही सही उनके गीत गा रहे थे और परंपरा के विपरीत इस यात्रा में महिलाएं भी मौजूद थीं. भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में जन्मे गिर्दा एक फक्कड़ ग्रामीण गवैया थे. अल्मोड़ा शहर में आने के बावजूद उनके भीतर का ग्रामीण नहीं मरा. वो जय जगदीश हरे के संस्कारों को लेकर पैदा तो हुए पर जीया जन की परंपरा का जीवन. गिर्दा को गीतों की प्रेरणा मोहन सिंह रीठागाड़ी, केशव अनुरागी और गोपीदास सरीखे लोकगायकों से मिली. गिर्दा एक बार घर से भागे पर ऐसी जगह जहां पहाड़ का कोई आदमी भागकर नहीं जाता. वो पीलीभीत गये और वहां अपनी जीविका के लिये रिक्शा चलाया. वो कहते थे कि रिक्शा चलाना हल चलाने जैसा ही तो हुआ. गिर्दा को जीवन भर एक रोग लगा रहा. संपत्ति न जोड़ने का रोग. उसकी आवश्यकताएं हमेशा न्यूनतम रही. एक कुर्ता पहना, झोला लटकाया और निकल पड़ा. कुछ समय पीडब्ल्यूडी में नौकरी करने के बाद सन 67 में वो संगीत एवं नाटक प्रभाग से जुड़े. उस दौर में उसने मोहिल माटी जैसे नाटकों का लालकिले में मंचन किया. विजेंद्र लाल शाह, पंचानन पाठक, कर्नल गुप्ते और लेनिन पंत जैसे संस्कृतिकर्मियों का साथ उन्हें मिला. सन 77 के दौर तक गिर्दा के सांस्कृतिक जीवन का रूपांतरण हो चुका था. वहीं से वो विकसित रंगकर्मी के रूप में उभरे और अब तक की पूरी सांस्कृतिक प्रक्रिया में वो एक मिथक बन गये. उन्होंने नैनीताल की निर्ममता को इस तरह बदला कि पूरा नैनीताल सड़क पर आने को विवश हो गया. उन्हें केवल हिमालयी अंचल का मानना उन्हें छोटा करके देखना होगा. उन्होंने अपनी बाहर की खिड़कियां हमेशा खुली रखी. युगमंच, नैनीताल समाचार, उत्तरा जैसी कई शुरुआतें उनके बिना न हुई होती. गिर्दा एक छुपे हुए पत्रकार भी थे. भागीरथी में आयी बाढ़ के दौर में उनका वो पत्रकार बाहर आया. बाबा नागार्जुन और उनके बीच एक फक्कड़ दोस्ती हुआ करती थी. वो दोनों एक ही बीड़ी को चूस चूस कर पीते. जहां एक ओर चंडीप्रसाद भट्ट, राधाबहन और शमशेर सिंह बिष्ट जैसे राजनीतिक कार्यकर्ता उनके मित्र थे, वही दूसरी ओर गीतकार नीरज जैसी शख्सीयतों से उनकी दोस्ती थी. झूसिया दमाई पर किया गया उनका काम उनकी रचनात्मकता का एक छोटा सा नमूना है. घोर अव्यवस्थित और अनियमित जीवनशैली के बीच भी अपने काम के लिए उनमें गजब का अनुशासन था. वो अपने आसपास के समाज को लेकर हमेशा चिंतित रहे और ये चिंताएं मुख्यत: तीन बिंदुओं पर केंद्रित रहीं. उत्तराखंड बनने की प्रक्रिया की दृष्टिहीनता एवं लक्ष्यहीनता, वामपंथी एवं जनपक्षधर ताकतों में उभरा विखंडन और जनांदोलनों के साथियों के बीच पनपी संवादहीनता. किसी काम की शुरुआत के बाद स्वयं पृष्ठभूमि में चले जाना उनकी आदत थी. ऐसे में उन्होंने समाज के बीच हमेशा खाद की तरह काम किया.
नदी बचाओ अभियान की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता राधा भट्ट ने बताया कि नदी बचाओ अभियान की शुरूआत से लगभग 6 वर्ष पहले वो गिर्दा से मिलीं. उनके गीत इतने लोकप्रिय थे कि लक्ष्मी आश्रम में पढ़ने आने वाली लड़कियां भावविभोर होकर उन्हें गाती. गिर्दा जब आश्रम में आये, तो उन्होंने जाना गिर्दा अन्य लोकगायकों की तरह धुन और लय के लिए नहीं बल्कि उनकी भावनाओं के लिए गाते थे. यह भावुक गायन ही था कि लोग इन गीतों से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने लगते. उनका गाया गीत जैता एक दिन तो आलो… कुमाऊंनी लोगों का ‘वी शैल ओवरकम’ था. कोई भी जनांदोलन बिना जनकवि के चल ही नहीं सकता. आंदोलनों और उनकी पदयात्राओं में गिर्दा के गीत महज कुछ पंक्तियों में वो सब कह जाते जो एक लंबे भाषण में भी नहीं कहा जा सकता. कोई भी प्रतिरोध शुष्क हृदय लेकर नहीं जन्म ले सकता, उसके लिए एक भावपूर्ण हृदय चाहिए. गिर्दा जैसा हृदय.
समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने बताया कि गिर्दा के साथ वक्त बिताना एक आकर्षण की तरह था. उनके बिना नैनीताल की कल्पना करना भी बेमानी था. गिर्दा के जाने से जो शून्य सांस्कृतिक जगत में पैदा हुआ है, उसे भरना लगभग असंभव है. उनकी लिखी एक कविता से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी संवेदना कई आयामों में एक साथ अभिव्यक्त होती रही है. गिर्दा की रचनात्मकता को किसी एक शाखा में नहीं बांटा जा सकता. उन्होंने फैज और साहिर का कुमाऊंनी में अनुवाद किया तो नगाड़े खामोश हैं, अंधायुग और अंधेर नगरी जैसे नाटकों को मंचन और निर्देशन भी किया.
वरिष्ट कवि मंगलेश डबराल ने कहा की गिर्दा ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को व्यापक परिवर्तन की दिशा में मोड़ दिया था. कथाकार पंकज बिष्ट, आलोचक आशुतोष, मानवाधिकार कार्यकर्ता राजेंद्र धस्माना, सामाजिक कार्यकर्ता चंडीप्रसाद भट्ट ने भी गिर्दा से जुड़े संस्मरण सुनाये. युवा कवि रोहित प्रकाश ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति और साहित्यकार विभूति नारायण की छात्रविरोधी, महिलाविरोधी गतिविधियों के खिलाफ एक प्रस्ताव पढ़ा. आखिर में गिर्दा पर एक फिल्म दिखायी गयी, जिसका संकलन-संपादन दिलीप मंडल और अभिषेक श्रीवास्तव के सहयोग से रोहित जोशी और उमेश पंत ने किया था.
रिपोर्ट सौजन्य : नयी सोच ब्लॉग