जाने-माने लेखक राजेन्द्र यादव की बेटी रचना यादव से संगीता की बातचीत पर आधारित

राइटर, जो मेरे पापा हैं – रचना यादव

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Rajendra Yadav and Rachna

राजेन्द्रजी बेटी रचना के साथ

पापा को गुस्सा बहुत कम आता है. आता भी है तो पता ही नहीं चलने देते थे. एकदम कंट्रोल्ड. उनका दिल बहुत बड़ा है पैसे के मामले में. मैं लोगों के घर जाती थी तो उनके पापा बैंक की फाइलें, शेयर्स करते रहते थे. पर ये सब करते मैंने अपने पापा को कभी नहीं पाया. फाइनेंसली इतनी मजबूत हालत थी भी नहीं ज्यादातर फाइनेंसली हालात टाइट ही होते थे पर उनका दिमाग कभी पैसे पर अटकते नहीं देखा. और जो थोड़ा बहुत भी पैसा होता था तो उसे खुले दिल से खर्च करते हैं.  कंजूस बिल्कुल भी नहीं हैं.

हां, मगर उनसे ये नहीं होगा कि मेरी एक बहन है दिल्ली में, तो फोन करके उनसे पूछ लूँ. ये वो नहीं कर सकते. उनकी दो बहने यहाँ रहती हैं. तो उनसे किसी त्योहार पर ही मिल आए.  फोन ही कर लिया. ऐसा नहीं कर सकते हैं वे. पर दोस्तों से बहुत बनाकर रखेंगे. क्योंकि दोस्तों से बनाकर रहना किसी ड्‌यूटी के तहत नहीं आता है न.

कभी उनमें ये भाव आते नहीं देखा कि मैं साहब हूँ. चाहे वो चापरासी हो या कोई और सब बराबर. वैसे ही उनके साथ हंसना और बातें करेंगे. हमारे घर में जो जमादार आता था उससे लेकर, माली, दूधवाला, बिजली वाला, फोन वाला, सब साहब के भक्त और दोस्त होते थे. वे सब बहुत खुश रहते थे उनसे. तो इस तरह उनमें बड़ा-छोटा का भाव नहीं रहता था.

जैसे कि रहने के लिए नखड़े होते हैं न, वो नहीं है उनमें. कि मुझे ऐसा चाहिए, वैसा चाहिए. अब शायद-ऑब्भियसली उम्र के साथ एडजेस्ट भी हो जाता है आदमी. कहीं भी सुला दो.. यहीं बैठे-बैठे सो जाएंगे.  कुछ भी खा लेंगे. तो ये सब बहुत स्ट्रांग प्वाइंट है उनका.

फिर बहुत फोकस्ड, कमिटेड रहते हैं अपने को लेकर. इतने फोकस्ड कि फिर वे किसी को उसमें स्पेस भी नहीं देते हैं. कई बार वे ऐसा करते हैं कि क्यूंकि मैं इसमें बिलीव करता हूँ तो यह ठीक है. कि इसमें किसी और का भी प्वाइंट ऑफ व्यू हो सकता है. उसको भी कंसीडर किया जा सकता है.  वो उनके साथ नहीं हो सकता है.

वे कई बार इतने स्टबर्न, फिक्सड हो जाते हैं अपने आइडियाज को लेकर कि वे ऑब्जेक्टिविटी खो देते हैं. अब वे सुनेंगे तो फिर चिढ़ेंगे. इतने ज्यादा वन साइडेड हो जाते हैं कि फिर दूसरे का ना तो प्वाइंट ऑफ व्यू देखेंगे, न कुछ. ये बहुत ट्रिकी है कि वो कम्यूनिकेटिव नहीं है. दरअसल ऊपर से वे सबसे बोलते रहते हैं. पर अन्दर की बात क्या है वो किसी को पता तक नहीं चलने देते हैं.  बहुत ही मुश्किल से कभी किसी को अपनी बात बताते होंगे. पता नहीं किसको बताते होंगे?

अपनी तकलीफ कभी किसी को नहीं बताएंगे. अब किसी दोस्त-वोस्त को बताते हो तो मालूम नहीं. जैसे मम्मी फोन कर देंगी कि टिंकू आज मेरा पेट बहुत खराब हो रहा है, वो हो रहा है. पापा कभी नहीं बताते हैं. उनसे पूछ भी लो.  कैसे हैं? जबकि उनके घुटने में दर्द रहता है.  ‘ बिल्कुल फिट है. ‘ मैं पूछती हूं कि आपने चेकअप करा लिया.  ‘अरे करा लेंगे. फिट, एकदम फिट. ‘ कभी नहीं बताऐंगे कि कुछ हो रहा है. अगर कभी बता दिया कि थोड़ी तकलीफ है. मतलब वो सचमुच बहुत-बहुत पेन में हैं. तब वे थोड़ा सा बोलेंगे ‘अरे जरा सा घुटने में दर्द था. ‘ जब वो ऐसा बोल देते हैं तो मैं समझ जाती हूं कि वे बहुत तकलीफ में हैं.  कभी भी अपने तकलीफ से वे किसी पर बर्डन नहीं बनते हैं.

एक तरह से वो ऊपर से जो दिखते हैं वो नहीं हैं. भीतर से वे कुछ और ही हैं. ऊपर से तो वे एकदम खुलकर बात करेंगे कि तुम आओ. किसी का भी दुख है तो उसे सॉल्व करेंगे. इतने सेंसिटिव हैं. दरअसल अंदर से वो इतने सेल्फ-सेंटर्ड हैं कि वो सेंसिटिव तब-तक ही रहते हैं जबतक कि कोई उनकी लाइफ को एफेक्ट नहीं कर रहा हो.  किसी का दुख है तो वो दुख देखेंगे.  बोलेंगे हां-हां बहुत दुखी है, मुझे कुछ करना चाहिए.  पर कुछ करना चाहिए मतलब क्या? वो फोन उठाके चार फोन करके हेल्प कर देंगे. पैसे होंगे तो दे देंगे. आप उनको बोलिए कि इसको मदद करने के लिए तुमको इसी वक्त वहां जाना होगा. मान लीजिए कि बरेली जाना होगा. वहां पर लम्बी लाइन है वहां बैठे रहो. वो नहीं करेंगे. हो सकता है कि वो कर भी दें पर वो उनकी लाइफ, उनकी राइटिंग, उनकी राइटिंग का जो अपना टाइम है अगर उन्हें ऐसा लग जाए कि उन्हें अपनी राइटिंग छोड़नी पड़ेगी किसी की मदद करने के लिए तो वो नहीं करेंगे.

उनका अपना एक लाइफ स्टाइल हो गया है. अपना एक टाइम हो गया है.  लिखने-पढ़ने का काम, वो वैसा का वैसा ही चलता रहना चाहिए. कहने का मतलब है कि सेक्रीफाइज थोड़ा सा मुश्किल होता है उनके लिए.  पैसे जितने बोलो. नहीं भी होंगे तो मांग के वे देंगे.

अब तो मुझे उनका पता नहीं. पहले जब मैं वहां रहती थी. जैसे कि उनके फ्रेंड के साथ कोई गोष्ठी हो, कोई डिसकशन है या कहीं जाने का प्रोग्राम है, किसी प्रोग्राम में जाना है. जहाँ सब राइटर वगैरह आ रहे हैं और अगर घर में ऐसी कोई प्रॉबलम आ गई जिसके कारण नहीं जा पा रहे हैं तो बोलेंगे मन्नू, तुम संभालो. वे चले जाएंगे. उनके टाइम और उनकी लाइफ को किसी भी तरह प्रभावित नहीं होना चाहिए. तब तक वो सबकी मदद करने को तैयार रहेंगे. कहने का मतलब उनकी रुटीन, उनकी टाइमिंग, उनकी स्पेस-मैंटल, फिजीकल.  उनके स्पेस को छेड़िए मत आप.  मैं समझ नहीं पाती हूँ कि क्या साइकलोजी है उनकी कि बाहर के लोगों की मदद करेंगे वे, घर के लोगों कि नहीं. पर अब तो ऐसे नहीं हैं वे. अब तो काफी बदल गए हैं वे. ये नहीं कि वो कॉशसली सब सोच कर करते हैं. पर घर के लोग तो घर के लोग ही हैं न. जैसे हम उनके लिए घर के हैं वो हमारे लिए भी घर के हैं. कोई एक-दूसरे से ऑबलाइज,  कृतज्ञ तो नहीं महसूस करता है. क्योंकि ये तो आपकी ड्‌यूटी है. आप मेरे पिता हैं, ये तो आपको करना ही है.

पहले घर के लोगों के लिए, चाहे उनकी बहने हों, हमलोग हों, वे नहीं करते थे. जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे. पर अब वो करते हैं. मेरे चाचा आते हैं. एक चाचा के आंख में बहुत प्रॉबलम है. बहुत तकलीफ हैं उन्हें. तो अब पापा चाहते हैं कि उन्हें डाक्टर के पास ले जाऊं.  उन्हें दिखाऊं. अब वे बहुत करना चाहते हैं. पर अब सब लोग इतने तितर बितर हो गए हैं. पहले तो हम सब साथ ही रहते थे. छोटी बुआ, छोटे चाचा, मम्मी, मैं, सब लोग साथ रहते थे.  घर में तो वे कभी पूछते भी नहीं थे कि तुम ठीक तो हो.

हो सकता है जब वे नहीं कर पाते थे परिवार के लिए तब उनका अपना भी तो स्ट्रगल चल रहा था. और जब मैंटल स्ट्रगल चलती रहती है तो और चीजों के लिए स्पेस बहुत कम रह जाती है.

अब वो बहुत सेटेल्ड हो गए हैं. बहुत कूल हो गए हैं. उतना हबड़-तबड़ कि मैं ये भी कर लूं, वो भी कर लूं , ऐसे नहीं करते हैं. अब उनमें शांति आ गई है. अब उन्हें शायद ऐसा लगता है जो नहीं किया परिवार के लिए, उसे करें.

क्रमशः