वनीता देव सेन बांग्ला की सर्वाधिक चर्चित लेखिकाओं में से हैं. 65 वर्षीया नवनीता के लेखन का विस्तार बाल साहित्य, हास्य, गल्प, कविता से लेकर आलोचना और आत्मकथात्मक निबंधों तक जाता है. जादवपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरांत उन्होंने हार्वर्ड, कैम्ब्रिज और बर्कले विश्वविद्यालयों से भी शिक्षा पाई है. उनकी सर्वाधिक मौलिक कृतियों में से ‘स्टडी ऑफ वूमेनस रिटेलिंग ऑफ रामायणा’ है. उन्हें कई महत्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हुए हैं. हाल में नयी दिल्ली में हुए यूके-दक्षिण एशियाई लेखिका सम्मेलनः 2003 में उन्होंने भाग लिया. यह साक्षात्कार इसी सम्मेलन के संदर्भ में लिया गया है.यह साक्षात्कार का पहला हिस्सा है. इस अवसर पर राजेश रंजन ने दिल्ली में उनसे मुलाकात की और लंबी बातें हुईं.


navnita dev sen

नवनीता देव सेन

कल मैं अपने घर में काम करने वाली आया के घर शादी में गई थी, जिसकी बेटी की शादी पास के झुग्गियों में हुई है. मैं वहाँ गई थी. दहेज की मात्रा – फ्रिज, रंगीन टीवी, साइकिल, क्योंकि शायद वे कार नहीं खरीद सकते थे, अंगूठी, वाशिंग मशीन और क्या क्या नहीं– उसकी माँ मेरे घर में कपड़े धोती है और अपने दामाद को वह वाशिंग मशीन दे रही है – सब कुछ- तो यह स्त्री का अनुभव है. पुरूष का अनुभव क्या है? लड़का क्या करता है – कुछ भी नहीं. लेकिन उसके घर में यह सब आ रहा है. क्या इनकी कहानियां एक ही हैं? क्या एक दुनिया या एक ही अनुभव हैं? नहीं है. महिलाएँ लिखती हैं तो क्या हुआ? जब आप समानता की बात करते हैं तो पहले आपको दुनिया बदलनी पड़ती है. बलात्कारी को देखिए और बलात्कृत को. क्या एक ही बात है? नहीं.


आपने अभी-अभी यू.के.-दक्षिण एशियाई महिला लेखक सम्मेलन में हिस्सा लिया है. इस सम्मलेन का क्या महत्त्व है?

मै समझती हूँ कि वास्तव में महत्व इस बात को लेकर है कि इससे हम एक दूसरे को जान पाते हैं. यह भी जान पाते हैं कि अन्य लोग क्या लिख रहे हैं. प्रायः ऐसा होता है कि आप अपनी मातृभाषा में लिख रहे होते हैं और एक दूसरे के लेखन के बारे में नहीं जानते. बांग्लादेश में लोग बंगला लिख रहे हैं, नेपाल में नेपाली, श्रीलंका में सिंहली, तमिल व अंग्रेजी में. भारत में, आपको मालूम है हम बहुत सी भाषाओं में लेखन करते हैं. फिर यू.के. भी है. यू.के. के बहुत से लेखक हैं. एक कुर्दिश कवयित्री भी थी सम्मेलन में.यह एक अच्छा अवसर है मिलने जुलने का और विचार विनिमय का और देखने-परखने का. सबसे दिलचस्प बात यह थी कि हम लोग दक्षिण एशिया से एक बड़े समूह के रूप में थे. और यूरोप से एक छोटा समूह था, इंग्लैण्ड से.भारत से कुछ तो थी, लेकिन श्रीलंका और बांग्लादेश से पर्याप्त नहीं थी. और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह हुई कि पाकिस्तान से दो लोगों का आना तय था पर सीमा पार नहीं कर पाई-कुछ वीसा या राजनयिक समस्या को लेकर. हमने उन्हें बहुत मिस किया.

लेकिन इतनी बड़ी आबादी वाले देशों से इक्का-दुक्का लेखिकाओं की उपस्थिति पर्याप्त कही जायेगी?

मैं यह सोचती हूँ कि बांग्लादेश से सिर्फ दो, पाकिस्तान से दो, श्रीलंका से दो, नेपाल से एक पर्याप्त नहीं था. संभवतः दक्षिण एशिया के इस हिस्सों से कुछ और लेखक होने चाहिए थे.श्रीलंका के दोनों लेखक अंग्रेजी में लिखते हैं. नेपाल की मंजुश्री अंग्रेजी में लिखती हैं. अच्छा होता यदि एक ऐसी लेखिका भी शामिल होती जो नेपाली, सिंहली या तमिल में लिखती होतीं- अच्छा होता यदि इन तीनों भाषाओं से होती. बांग्लादेश से दो युवा लेखिकाएँ थीं. दोनों अंग्रेजी की बड़ी सशक्त लेखिकाएँ लेकिन श्रीलंका से दोनों ही लेखिकाएँ नाटककार थीं-और बड़ी सशक्त नाटककार थी दोनों. मैं मिली दोनों से. दो युवा बांग्लादेशी लेखिकाएं भी ऐसी थी, जिनके बारे में आपने पहले कभी नहीं सुना होगा. चूंकि हमलोग पश्चिम बंगाल में हैं और बांग्लादेशी साहित्य से संपर्क में हैं मगर ये युवा लेखिकाएं हैं…अभी लोगों तक इनकी पहुंच नहीं हो पाई है-उनसे मिलना अच्छा लगा-सशक्त लेखिकाएं हैं. और जहां तक नेपाल का सवाल है वहां की युवा लेखिका जो अंग्रेजी में लिखती हैं, बड़ी मुखर थी, उनका साथ होना अच्छा लगा. हमें बहुत कुछ पता चला – नेपाल के बारे में – अंदरूनी चीजें-सामान्यतः साहित्यिक परिदृश्य के बारे में. हमलोग राजनैतिक क्षेत्र से इतर सिर्फ साहित्यिक परिदृश्य में दिलचस्पी रखते हैं. यह पूर्णतः गैर राजनैतिक सम्मेलन था – जिसमें दो ही मुद्दे केंद्रीय थे. साहित्य और लिंग “gender”. महिलाएँ – लेखक के रूप में. इस क्षेत्र विशेष में”दक्षिण एशिया”.

हमने पाया कि दक्षिण एशियाई लेखन परिदृश्य यू.के. के लेखन परिदृश्य से मिलता जुलता है. जब हमने प्रकाशन, पाठक, सेंसरशिप, स्व-सेंसरशिप, पाठकीय प्रतिक्रिया, पारिवारिक प्रतिक्रिया पर बातें की तो पाया कि सबकुछ बहुत मिलता जुलता है. हम लगभग एक ही भाषा बोल रहे थे और हमने तुरन्त पहचाने. ये मुद्दे – लैंगिक मुद्दा और रचनात्मक व्यक्ति होने का मुद्दा “लेखक होने का”. ये मुद्दे वस्तुतः संस्कृतियों की सीमा के परे जाते हैं. हालांकि ऐसी उम्मीद नहीं की जाती. हमने सोचा कि हम तो उनसे पीछे रहे हैं. महिलाओं की स्वतंत्रता विश्व के इस हिस्से में बाद में आई है. नई दृष्टि यूरोप में 60 वें और 70 वें दशक में जाकर पनपी. हमारे यहाँ उनकी तुलना में यह बहुत बाद में आया. अतः हमारी कल्पना थी वे काफी प्रगति कर चुके होंगे, पर वैसा है नहीं. मेरा मतलब है – यह परिदृश्य, घर में या पाठकवर्ग या प्रकाशन आदि का. अतः यह आँखें खोलने वाला रहा हमारे लिए भी, उनके लिए भी. और जहां तक भारतीय लेखिकाओं का सवाल है, वे युवा हैं और यह मिलना अच्छा रहा.

इस सम्मेलन में कौन सी चीजें आपको लगा कि कुछ भिन्न होना चाहिए?

एक चीज मैंने महसूस की कि हमारे सत्रों की संख्या बहुत ज्यादा थी विमर्श के सत्रों की. जबकि ‘पाठ’ के सत्र ज्यादा होने चाहिए थे. काव्य-पाठ का सत्र तो बिल्कुल ही नहीं था. पूरी कहानी तो सुनी ही नहीं गई. किसी के पास भी पूरा-पूरा कुछ नहीं था. सबने केवल कुछ अंश पढ़े.इस तरह से लोग एक दूसरे से परिचित नहीं हो पाते. बेहतर होता यदि हमारे पास और लम्बे सत्र होते जिनमें हम एक दूसरे को ज्यादा सुन पाते -रचनात्मक पक्ष को, तो हमें ज्यादा खुशी होती. और हमारा एक बहुत ही छोटा सत्र था – अनुवाद पर. अनुवाद पर ज्यादा ध्यान देना चहिए था. ज्यादा लंबा सत्र होना चहिए था. अनुवादों के प्रकाशन पर, अनुवादकों के प्रशिक्षण पर – क्योंकि जबतक आप ऐसा नहीं करते, हमारे लिए एक दूसरे को जानना सचमुच बड़ा कठिन हो जाता है. क्योंकि हम अभी भी अपनी मातृभाषा में, क्षेत्रीय भाषा में लिख रहे हैं-जबतक अनुवाद नहीं होंगे, आप एक दूसरे को जानेंगे नहीं. सभी भारतीय भाषाओं को तो सीखना संभव है नहीं.पर यदि आप किसी भारतीय लेखक या पाकिस्तानी लेखक या सिंहली लेखक को जानना चाहें-तो अनुवाद के बिना कैसे जानेंगे? अतः मैं सोचती हूँ कि हमें अनुवाद समस्या के ऊपर इस तरह का, इस स्तर का सेमिनार आयोजित करना चाहिए.आपको यह करना होगा और इसके लिए एक बड़ा प्रायोजक ढूंढना होगा.

इस तरह का सम्मेलन तो अच्छी बात है, लेकिन इससे हम कहाँ पहुँचते हैं? और मैं यह भी सोचती हूँ जो सायंकालीन मनोरंजन के कार्यक्रिम आदि थे-
उन्हें नहीं होना चाहिए था. हमे अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए था – सिर्फ बातचीत, विचार विमर्श के लिए, हमें एक दूसरे को जानने का अवसर दिया जाना चाहिए था. बातचीत करने का और साथ होने का अवसर दिया जाना चाहिए था, क्योंकि लोग अलग अलग स्थानों में के हुए थे. कुछ आनंदग्राम में रूके तो कुछ होटल ब्रिस्टल में और कुछ दिल्ली वाली सहभागिनी तो वापस घर गईं.अच्छा होता यदि हम सभी आनंदग्राम में क सकते. आनंदग्राम एक प्यारी जगह है -हमें, हम सबको यहाँ होना चाहिए था, शामें बिताते, बातें करते, हंसते, गाते, चुटकुले सुनाते – तब बात फर्क होती. यही मैंने मिस किया यदि आप पूछें क्या मैंने कुछ मिस किया है. थोड़ा सा.

दक्षिण एशिया आज बहुत बिखरा-बिखरा सा लगता है – राजनैतिक रूप से और कुछ हद तक सांस्कृतिक रूप से भी. क्या दक्षिण एशियाई महिला लेखक जैसी किसी पहचान का सचमुच कोई अस्तित्व है?

राजनैतिक पहचान का महत्त्व नहीं है. जहाँ तक महिला के रूप में, लेखिका के रूप में और दक्षिण एशियाई महिला लेखक के रूप में पहचान का प्रश्न है-यह अभी तक उठा नहीं है. दुर्भाग्य से, हमें अफसोस है कि पाकिस्तान की महिलाएँ नहीं आ सकीं “सम्मेलन में”. हमें उनके लेखन के बारे में मालूम है और हम बहुत सी पाकिस्तानी महिला लेखकों को जानते हैं और हम एक्टिविज्म के बारे में बात नहीं कर रहे.हम सिर्फ लेखकों के बारे में बातें कर रहे है और सशक्त लेखिकाएँ हैं, अच्छी लेखिकाएँ. और जो भाषा वे बोलती हैं, जो भावनाएं वे अभिव्यक्त करती हैं, जो अनुभव वे बयान करती हैं, वे हमारी हैं. हममें कोई फर्क नहीं हैं – चाहे बंगलादेशी लेखन हो, सिंहली नाटक हों, भारतीय लेखन हो. क्योंकि यदि आप समूचे भारत को देखें, यह बहुत विस्तृत हैं, बहुत महान, विशाल भूखण्ड, ढेरों भाषाएँ, एक महाद्वीप की तरह.
उपमहाद्वीप तो यह है ही. और संस्कृतियाँ बहुत भिन्नता लिए हुए हैं. आप तमिलनाडु की संस्कृति को देखें और पंजाब की देखें, वे समान तो बिल्कुल नहीं हैं. फिर आप साहित्य को पढ़ें या महिला लेखन को, तो आप भारत को पहचान पाते हैं, आप भारतीय महिला को तुरन्त पहचान पाते हैं. आप कृष्ण सोबती को पढ़ें और फिर लक्ष्मी कण्णन शेषलक्ष्मी को – वे बहुत अलग हैं. लेकिन हर जगह आप उसी नारी को पाते हैं – भारतीय नारी के अनुभवों को – जो कि इस उपमहाद्वीप की नारी का भी अनुभव है.

मुझे कहना चाहिए कि मैं ऐसी किसी विशेष पहचान को नहीं देखती-जो इस उपमहाद्वीपीय नारी की पहचान को बाधित करती हो. मैं राजनैतिक लेखन के बारे में नहीं जानती, लेकिन वहां भी यदि आप अच्छी लेखिका हैं तो आपकी एक सार्वभौमिक अपील होती है. और सार्वभौमिक अपील इन सीमाओं से ऊपर उठती है. जहाँ तक आपके प्रश्न की बात है , तो इस सम्मेलन से एक बेहद विशिष्ट पहचान निर्मित हुई है – आपस में विचार विमर्श के माध्यम से, एक दूसरे को देख-परख कर. और मुझे फिर कहना चाहिए कि पाकिस्तान को हमने बहुत मिस किया है. वहां जो स्थिति है “पाकिस्तान में”, वह बांग्लादेश और श्रीलंका से बहुत अलग है.

लेखन को श्रेणियों में क्यों बांटा जाय? क्या ऐसा नहीं है कि साहित्य जीवन को संपूर्णता में समाहित करता है? क्या नारी और पुरूष लेखन को अलगाया जाना चाहिए और क्यों?

यह बहुत पुराना प्रश्न है. जब से नारी “समानता” का प्रश्न खड़ा हुआ है “या नारी लेखन का” – हमेशा से केवल पुरूष-संसार यह प्रश्न करता आया है. और उत्तर भी हमेशा एक ही रहा है. हां, ऐसा है. कारण भिन्न हैं. अनुभव भिन्न हैं. एक ही दुनिया में हम रहते हैं. लेकिन पुरूष अलग ढंग से रहते हैं-स्त्रियां अलग ढंग से. हमारे अनुभव एक ही नहीं हैं. हमारे एक-सा व्यवहार नहीं किया जाता. मैं यह नहीं कहती कि यह उच्च अथवा निम्न है, मगर यह समान नहीं है, एक सा नहीं है.

दरअसल कभी- कभी स्त्रियां सोचती हैं कि क्या यह एक ही दुनिया है? स्त्रियां शायद किसी दूसरी दुनिया में रहती हैं. हमारे भिन्न अनुभव हैं. एक सी घटना को लें, उदाहरण के लिए शादी ही को या बलात्कार यह पुरूष और महिला के लिए अलग-अलग है. एक सकारात्मक चीज, शादी, को लें. पुरूष या दूल्हे का अनुभव दुल्हन के अनुभव जैसा नहीं होता. दूल्हे के घर को देखें, दुल्हन के घर को देखें. पहला एक सकारात्मक अनुभव है. कल मैं अपने घर में काम करने वाली आया के घर शादी में गई थी, जिसकी बेटी की शादी पास के झुग्गियों में हुई है. मैं वहाँ गई थी. दहेज की मात्रा – फ्रिज, रंगीन टीवी, साइकिल, क्योंकि शायद वे कार नहीं खरीद सकते थे, अंगूठी, वाशिंग मशीन और क्या क्या नहीं– उसकी माँ मेरे घर में कपड़े धोती है और अपने दामाद को वह वाशिंग मशीन दे रही है – सब कुछ- तो यह स्त्री का अनुभव है. पुरूष का अनुभव क्या है? लड़का क्या करता है – कुछ भी नहीं. लेकिन उसके घर में यह सब आ रहा है. क्या इनकी कहानियां एक ही हैं? क्या एक दुनिया या एक ही अनुभव हैं? नहीं है. महिलाएँ लिखती हैं तो क्या हुआ? जब आप समानता की बात करते हैं तो पहले आपको दुनिया बदलनी पड़ती है. बलात्कारी को देखिए और बलात्कृत को. क्या एक ही बात है? नहीं. और लोग क्या कहते हैं? वह अंधेरी गली से क्यों गुजर रही थी? उस प्रहर में? वह ऐसे कपड़े क्यूं पहने थी? वह ऐसी क्यों? वह ऐसी क्यों? वह ऐसी क्यों? स्वाभाविक रूप से पुरूष ऐसा सोचेगा. पर पुरूष का स्वभाव ऐसा होना ही क्यों चाहिए?

आप देख सकते हैं कि यह ‘समान’ दुनिया नहीं है. और इसीलिए जब एक स्त्री लिखती है, स्त्री के लेखन में ऐसी बहुत सी चीजे होंगी, जो पुरूष नहीं देख पाते. क्योंकि यह उनके अनुभव के परे की चीज है. यह जरूर है कि हम स्वयं भी बहुत सी चीजों को नहीं देख पातीं, पर हमें पुरूषों की निगाह से देखने को मजबूर किया जाता है. उनके दृष्टिकोणों से साझेदारी करने को मजबूर किया जाता है. क्योंकि हमारे पास अपना दृष्टिकोण रहा ही नहीं. पर अब हमने स्वयं को अपनी निगाह से देखना सीख लिया है. सिर्फ स्वयं को ही नहीं, विश्व को भी, भूतकाल और भविष्यत्‌ को भी. हमने इतिहास को नई निगाह से देखने की दृष्टि पा ली है. इतिहास को पुरूष अपने कब्जे में रखते रहे हैं और इतिहास युद्धों का, विजयों का, पराजयों का रहा है.

सांस्कृतिक इतिहास एक नई चीज है और आप जानते ही हैं कि पुरूष वहां भी क्या क्या गुल खिला रहे हैं और स्त्रियाँ? बच्चे पैदा करने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ करती रही हैं. और वे क्या करती रही हैं? अब स्त्रियां स्त्रियों के बारे में सोच रही हैं. अब हम इसका अनुसंधान कर सकते हैं कि इतिहास में, उस अंधेरे और मूक इतिहास में क्या करती रही हैं. इतिहास में आप स्त्रियों को नहीं पाएंगे. पर वे रही तो हैं- तो जब आप पुरूष और स्त्री के समान होने की बात करते हैं और पूछते हैं कि क्यों हमारा पृथक साहित्य होना चाहिए तो मैं कहूंगी कि हम अलग साहित्य नहीं चाहते. साहित्य एक ही है.

हां, आपने ठीक कहा कि स्त्री-पुरूष के अनुभव भिन्न होते हैं. स्त्रियाँ लिखकर साहित्य में क्या योगदान दे रही हैं?

जब स्त्रियां लिखती हैं, तो संभवतः वे ऐसी चीजों का योगदान कर रही हैं जो पुरूष नहीं कर सकते . वे रिक्तियों को भर रही हैं.हमारी जिंदगी में रिक्तताएँ हैं. इतिहास में रिक्तताएँ हैं, समाजशास्त्र में हैं और साहित्य में हैं. इसलिए जब स्त्रियाँ लिखती हैं तो वे इन रिक्तताओं को भर रही होती हैं. यह तो साहित्य को और मजबूत बना रही हैं. और सम्पूर्ण बना रही हैं. और व्यापक बना रही हैं.और जो दृष्टि है वह ज्यादा समानतापरक है. मैं स्त्रियों और पुरूषों के बीच द्वंद्व में विश्वास नहीं रखती. मैं अपने पिता और पुत्र से, पति से लड़ना नहीं चाहती. मैं नहीं समझती कि पुरूष विरोधी प्रोपेगैंडा, या घृणा जैसी चीजों का कोई सवाल है.

कोई इनमें विश्वास नहीं रखता. सभी अपने परिवारों में रह रहे हैं पिता, पुत्र, पति के साथ.ऐसा नहीं है. सिर्फ ऐसा है कि ऐसे अनुभव जिनके बारे में पुरूष नहीं लिखते, उन्हें हम लिखते हैं. और शीघ्र ही पुरूष इनको समझना आरंभ कर देंगे. क्योंकि युवा पुरूष, मैं समझती हूँ, काफी बदल चुके हैं. 20 से 25 की आयु के युवा पुरूष महिलाओं की समस्याओं के बारे में बहुत-बहुत जागरूक हैं.और वे सहायता भी करते है और मैं समझती हूँ शीघ्र ही शायद अगले 10 या 15 वर्षों में समस्याएं सम्भवतः चली जाएंगी. ये दैवी विधान से पैदा हुई समस्याएं नहीं है – पुरूष व स्त्रियों की बनाई हुई हैं. पुरूषों ने इन्हें बनाया है और स्त्रियों ने इन्हें स्वीकार किया है. अब अगर आप इनको स्पष्ट करते हैं, जनसामान्य तक यह बात पहुंचाते हैं, पुरूष और स्त्रियों को इन असमानताओं के प्रति जागरूक करते हैं तो चीजें बदलेंगी. और यदि आप लिखेंगे नहीं तो नहीं बदलेंगी. इसलिए मैं सोचती हूँ कि स्त्रियाँ स्त्रियों की तरह लिखें, यह महत्त्वपूर्ण है. और उन्हें इसके प्रति लज्जा नहीं होनी चाहिए. प्रायः ऐसा होता भी है. मैंंने बहुत सी स्त्रियों को यह कहते सुना है कि मैं तो स्त्री-लेखक नहीं हूँ, मैं नारीवादी “फेमिनिस्ट” नहीं हूँ. मैं सिर्फ ह्‌यूमैनिस्ट “मानवतावादी” हूँ.

क्या वास्तव में दोनों में कोई फर्क है?

प्रत्येक फेमिनिस्ट ह्‌यूमैनिस्ट है पर प्रत्येक ह्‌यूमैनिस्ट फेमिनिस्ट नहीं है. हाँ, यह सच है. प्रत्येक ह्यूमैनिस्ट, यदि वह सच्चा ह्यूमैनिस्ट है, तो उसे नारीवादी होना चाहिए. क्योंकि वह तो अल्पसंख्यकों का पक्षधर, सताए हुए लोगों का, असमानता के शिकार लोगों का और उसकी आँखें स्वभावतः स्त्रियों पर टिकेंगी. मैं नहीं समझती कि यह कहना लज्जाजनक है कि मैं फेमिनिस्ट हूँ, खासकर जब कोई स्त्री यह कहती है. मैं नहीं जानती, क्यों स्त्रियाँ कहती हैं कि नहीं, नहीं मैं फेमिनिस्ट नहीं. मैं समझती हूँ वे ऐसा इसलिए करती है कि यहाँ अतिवादिता जुड़ जाती है. इसी अतिवादिता से ग्रस्त नारियाँ घृणा फैलाने वाली बातें करती आई हैं और इससे हमें हानि हुई हैं.

हमारी पीढ़ी अपने माता-पिता की पीढ़ी और अपनी संतानों-इन दोनों पीढ़ियों के दबाव में रही है. मैं समझती हूँ, एक ढंग से हमने दोनों से ही बहुत सीखा है, एडजस्ट करना, और एडजस्ट किया है और यह भी सीखा है कि बहुत से काम किए जा सकते हैं बिना चीखे-चिल्लाए, बोलकर. चीखने से आप लोगों तक अपनी बात नहीं पहुंचा सकते. लोग चुप हो जाते हैं अगर कोई चिल्ला रहा है तो. वे सुनते नहीं. हम चाहते हैं अपनी बात लोगों तक पहुंचाना. लोग सुनें, सोचें और उसे क्रियान्वित करें-मैं समझती हूँ स्त्रियां बस इतना ही चाहती हैं. स्त्रियां इस विश्व को सकारात्मक ढंग से बदलना चाहती हैं. देश के उन हिस्सों को भी बदलना चाहती हैं, जहाँ कम जागरूकता है. हम इसे बदलना चाहती हैं. हम चाहते हैं हमारे बेटे-बेटियों को समान अवसर मिलें, हमारे बेटे-बेटियां एक दूसरे का सम्मान करें और समान प्रतिभा का विकास करें. यह संभव है. इस सम्मेलन के बाद हम इसी नतीजे पर पहुँचे हैं. कि सिर्फ हमीं नहीं, बल्कि यू.के. में भी स्त्रियों के पास अवसर की समानता नहीं है. समान सम्मान नहीं है. हमारी समस्याएँ बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत नहीं की गई. इन समस्याओं पर वे यू.के. में भी काबू नहीं पा सके हैं.

यू.एस.ए. में भी इन चीजों के बारे में बहुत शोर मचाया जाता है. अतः  इसमें बहुत समय लग रहा है. लेकिन मेरा विश्वास है कि चीजें बदलेंगी, और दुनिया बेहतर होगी. जबतक विश्व में लडा.इयाँ हैं -फेमिनिज्म रहेगा. क्योंकि नारीवाद हमेशा संघर्ष रोकने को बढ़ावा देता है. हमेशा एक बिन्दु रहेगा जिसपर स्त्री और पुरूष नहीं मिलते और वह है युद्ध और शान्ति का बिन्दु. स्त्रियां हमेशा शांति की पक्षधर हैं. हम नहीं चाहतीं अपने बच्चों की मौत. हम नहीं चाहती हमारे बच्चे लड़ाइयों में जाएँ. और हम देखें कि किस तरह चीजें बदलती हैं. आपने कहा कि  कि विखंडित है “दक्षिण एशिया”.यह है. क्योंकि हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है. हम नहीं जानते हम कहां जा रहे हैं. हम क्यों आपस में लड़ रहे हैं? हम बहुत गरीब हैं. हमारे पास समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है. हम क्यों नहीं एक दूसरे का हाथ पकड़ कर आगे बढ़ें? हमें वहाँ तक पहुँचने के लिए काफी लम्बी दूरी तय करनी है. हम अपनी सारी ऊर्जा भीतर ही, एक दूसरे से लड़ने में खर्च कर रहे हैं. यह महाभारत की तरह है. पता नहीं हम इससे कैसे
उबरेंगे.

क्रमशः