खूनी बुनियाद पर बने राम मंदिर में जाने में शर्म आएगी मुझे – अशोक वाजपेयी
तेरह वर्ष की उम्र में ही अशोक वाजपेयी ने तय कर लिया था कि उन्हें कवि बनना है. अशोक वाजपेयी के मन में उपजी इस आकांक्षा ने पच्चीस वर्ष की उम्र में ठोस धरातल पाया अपने पहले काव्य संग्रह ‘शहर अब भी संभावना है’ के रूप में. तब से अबतक लगातार कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी के वितान का विस्तार होता गया. उमर के साठ के पड़ाव को पिछले साल ही पार कर चुके अशोक वाजपेयी ने ‘हिंदी कविता के निरंतर सिकुड़ते जा रहे क्षेत्र को प्रशस्त और उदार’ बनाने का भरसक प्रयत्न किया है.
अशोक वाजपेयी को पिछले साल छत्तीगढ़ सरकार ने अपना संस्कृति सलाहकार बनाया है. पेरिस में रहने वाले भारतीय कलाकार सैयद हैदर रजा की वाजपेयी द्वारा लिखी जीवनी हाल ही में लोकार्पित की गई है. वे अभी महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति भी हैं. साहित्य-संस्कृति की कई अन्य व्यस्तताओं के बीच वे कई महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े हैं. प्रस्तुत है अशोक वाजपेयी की राजेश रंजन के साथ बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश.
अव्वल तो विश्व हिंदू परिषद् हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती. अगर करती भी है तो कुछ सिरफिरे हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करती है. मेरे हिसाब से हजारों लोगों के खून से सींचकर जिसकी बुनियाद रखी जाये, वैसा मंदिर राम का हो नहीं सकता और हिंदू के नाते ऐसे मंदिर में जाने से शर्म और लज्जा का अनुभव करूंगा मैं. और सौभाग्य से इस देश की अधिकांश जनता धार्मिक सद्भाव, मेल जोल, आपसदारी पर विश्वास करती है. दुर्भाग्य की बात यह है कि इस समय वह अपने आप को एसर्ट नहीं कर रही है. उसको एसर्ट करना चाहिए. क्योंकि जाहिर है कि सरकार और धार्मिक नेताओं के संगठनों चाहे वे हिंद्रुओं के हों, मुसलमानों के हों या सिक्खों के हों या चाहे जिसके भी हों इसपर हम भरोसा नहीं कर सकते हैं. ये सब एक तरह से लोकतंत्र की बुनियादी मर्यादाओं का पालन तक करने में कोताही कर रहे हैं.
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् द्वारा हाल में करवाया गया भारतीय साहित्य का अन्तर्राष्ट्रीय उत्सव वास्तव में अप्रवासी भारतीय अंग्रेजी साहित्य का अन्तर्राष्ट्रीय उत्सव होकर रह गया. इसके अतिरिक्त भारत सरकार की वित्त पोषित एक संस्था द्वारा भारतीय लेखकों की घोर उपेक्षा भी हुई. इसे आप कैसे देखते हैं?
देखिए, किसी हद तक भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् का काम विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार से है. इसलिए अगर वो भारत के बाहर रहने वाले लेखकों को बुलाते हैं तो इसमें कोई परेशानी की बात नहीं हैं. लेकिन जिस ढंग से यह समारोह किया गया, जिसमें डेढ़ पुस्तक लिखे अंग्रेजी लेखकों की तो प्रतिष्ठा थी परंतु पच्चीस-पच्चीस पुस्तकें लिखने वाले लेखक की स्थिति कुछ इस तरह थी कि . . . , यह बात अपने आप में बहुत ही आपत्तिजनक कही जा सकती है. यह जाहिर है ऐसा इसी संस्था ने किया जिसमें वैसे तो बड़े बड़े लोग उपराष्ट्रपति सहित सम्मिलित हैं, लेकिन इसका ख्याल नहीं किया कि इसका क्या असर होगा. मैं समझता हूं कि पिछले चालीस पचास वर्षों में भारतीय सरकार द्वारा पोषित किसी संस्थान द्वारा भारतीय भाषाओं के लेखकों का ऐसा अपमान नहीं किया गया जितना इस बार हुआ.
साम्प्रदायिकता देश के लिए आज भी एक बड़ा खतरा है. बहुसंख्यक समुदाय के बीच धर्मोन्माद को पहली बार हवा दी जा रही है. आपको इस स्थिति पर क्या कहना है?
बहुत ही शर्मनाक है. अखबार में आज निकला है कि विश्व हिंदू परिषद् अदालत का फैसला मानने को राजी हो गई है. यह कोई बात हुई? विश्व हिंदू परिषद् है कौन? इस देश का कोई भी संगठन जो इस देश के लोकतंत्र और संविधान की बुनियादी शर्तों को नहीं मानता हम उसको मना रहे हैं. यह हमारी हालत हो गई है. अव्वल तो विश्व हिंदू परिषद् हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती. अगर करती भी है तो कुछ सिरफिरे हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करती है. मेरे हिसाब से हजारों लोगों के खून से सींचकर जिसकी बुनियाद रखी जाये वैसा मंदिर राम का हो नहीं सकता और हिंदू के नाते ऐसे मंदिर में जाने से शर्म और लज्जा का अनुभव करूंगा. और सौभाग्य से इस देश की अधिकांश जनता धार्मिक सद्भाव, मेल जोल, आपसदारी पर विश्वास करती है. दुर्भाग्य की बात यह है कि इस समय वह अपने आप को एसर्ट नहीं कर रही है. उसको एसर्ट करना चाहिए. क्योंकि जाहिर है कि सरकार और धार्मिक नेताओं के संगठनों चाहे वे हिंद्रुओं के हों, मुसलमानों के हों या सिक्खों के हों या चाहे जिसके भी हों इसपर हम भरोसा नहीं कर सकते हैं. ये सब एक तरह से लोकतंत्र की बुनियादी मर्यादाओं का पालन तक करने में कोताही कर रहे हैं.
सैयद हैदर रजा को आप अपने ‘सप्तर्षि’ में मानते हैं. रजा के व्यक्ति और कृति पर केंद्रित आपकी लिखी ‘रजा’ हाल ही में आई है और काफी चर्चा में है. आपके सप्तर्षि की श्रृंखला में एक दूसरे में क्या साझा है और सबों के बीच अंतर क्या है?
देखिए, अन्तर तो बहुत हैं. मेरे सप्तर्षि हैं- साहित्य से लीजिए तो अज्ञेय, मुक्तिबोध और शमशेर, चित्रकला में जगदीश स्वामीनाथन और सैयद हैदर रजा एवं संगीत में कुमार गंधर्व, माल्लिकार्जुन मंसूर. मेरे हिसाब से ये सात मूर्धन्य हैं जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में एक बुनियादी काम किया और जिसको हम भारत का सांस्कृतिक व्योम कहेंगे. पिछले 50 वर्षों में, इस पर ये छाए रहे. लेकिन ये मेरा चुनाव है. कोई और चाहे तो किसी और को चुन सकता है. बुनियादी तौर पर मुझे लगता है कि सातों ने परंपरा और आधुनिकता के बीच अपने-अपने ढंग से एक नया संतुलन, एक नया सर्जनात्मक बेचैन संतुलन स्थापित किया. यही इनमें समानता है लेकिन बाकी बहुत सारे अलग अलग हैं. सैयद हैदर रजा की कला स्वामीनाथन की कला यात्रा से अलग है. कुमार गंघर्व ने लोक और शास्त्र के बीच जो संबंध स्थापित किया वो बिल्कुल दूसरे ढंग का है. मल्लिकार्जुन मंसूर परंपरा को अपने लिए पर्याप्त मानते थे. अज्ञेय में परंपरा का बोध भी है और आधुनिकता की बेचैनी भी. मुक्तिबोध में दूसरी बात है वगैरह-वगैरह. यह अलग अलग हैं लेकिन समानता यह है कि सभी ने परंपरा के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि रखी है लेकिन आधुनिकता को भी एक आलोचनात्मक दृष्टि में ही स्वीकार किया है.
आजकल आपकी कविता में किसी न किसी रूप में बालक बहुत आता है. बच्चे का बार-बार आना क्या ‘हमारे अपने जीवन का ही आगे बढ़ना है’ या कुछ और भी?
असल में इसका एक सीधा ठोस कारण तो मेरा पोता है. वो बहुत समय मेरा ध्यान बंटाता रहता है. मेरी कविता में बच्चे पहले भी रहे हैं. मुझे हमेशा लगता रहा है कि एक तरह का अबोधन जिसे हम बचपन में ही खो देते हैं और फिर उसे जिंदगी भर तलाशते हैं. उस पर लौट नहीं सकते क्योंकि हम अबोध हो नहीं सकते, लेकिन फिर भी एक ललक बनी रहती है. और जब आप चारो तरफ झूठ, प्रपंच और हिंसा से घिरे हों तो बच्चे ही हैं जो एक तरह की उम्मीद की लौ बनकर चमकते हैं, जो भरोसा दिलाते हैं कि दुनिया बच सकती है, बचायी जा सकती है.
अब महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से संबंधित कुछ सवाल, जिस विश्वविद्यालय के आप कुलपति भी हैं. स्थायी भौतिक आकार कब तक ले पायेगा यह विश्वविद्यालय ?
कितने दिनों में हो पायेगा यह कहना तो कठिन है. लेकिन अब हमने उस जमीन को घेर लिया है. जमीन पर एक इमारत भी ‘प्रथमा’ नाम से बना ली है. जुलाई में हम वर्धा में कक्षाएं शुरू कर देंगे.
हिंदी पर केंद्रित एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनाने की चुनौती स्वीकार कर आप कैसा अनुभव कर रहे हैं? सूचना प्रौद्योगिकी की इस विश्वविद्यालय में क्या भूमिका होगी?
निश्चित रूप से हिंदी पर केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनवाना चुनौती भरा है. मुझे चुनौती लेना पसंद है और प्रशासन में भी मैंने यही सब किया है. प्रशासन की दृष्टि से बलशाली प्रभुत्वशाली विभाग में मैं न ही गया और न ही वे मेरी आकांक्षा के केंद्र थे. मेरी योजना इस विश्वविद्यालय को बिल्कुल विशिष्ट किस्म का विश्वविद्यालय बनाने की है. उसे नाटकीय ढंग से कहें तो मानविकी में हिंदी में एक आई.आई.टी. बनाने की योजना है. सूचना प्रौद्योगिकी के जीवन में बढ़ते दखल को ध्यान में रखते हुए हमारे विश्वविद्यालय में यह व्यवस्था होगी जिसके तहत् कोई भी पाठयक्रम बिना एक चौथाई सूचना प्रौद्योगिकी के पाठ्यक्रम के पूरा नहीं माना जायेगा. इसलिए कोई भी पाठ्यक्रम चाहे वह भाषा में हो, चाहे साहित्य में, संस्कृति में, चाहे अनुवाद में इसका बड़ा हिस्सा सूचना प्रौद्योगिकी का होगा. यानी कोई भी व्यक्ति तबतक एम. ए. नहीं कर सकता है जबतक एक चौथाई पाठ्यक्रम सूचना प्रौद्योगिकी में पूरा नहीं किया हो. हमारी एक बड़ी योजना है साइबर परिसर बनाने की है. यानी हर किसी को हमारे विश्वविद्यालय आने की जरूरत नहीं है. अपनी जगह पर रहते हुए व्यक्ति हमारे विश्वविद्यालय से जुड़ सकता है. इसके साथ ही प्रविधियों के खर्चीलेपन को कम करके उसे लगभग निशुक्ल स्तर पर उपलब्ध कराने की भी हमारी योजना है. हमने लेबोरेटरी ऑफ इन्फारमेटिक फार लिबरल आर्ट यानी ‘लीला’ नामक प्रकल्प बनाया गया है. इसके अन्तर्गत ही एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में हिंदी के माध्मम से अनुवाद करने की कोशिश कर रहे हैं. यूरोप में यह कार्य अंग्रेजी के माध्यम से होता है. मेरे कार्यकाल के दौरान मेरी सारी योजनाएं भौतिक आकार ले लें. इसमें कठिनाइयां तो होंगी, परंतु विश्वविद्यालय का एक परिसर और उसकी बौद्धिक अकादमिक गतिविधियों का आरंभिक विस्तार तो मेरे कार्यकाल के दौरान हो जायेगा. आगे जो लोग आयेंगे वो देखेंगे.
महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएं भी निकल रही हैं. खासकर हिंदी के बारे में बताएं जो अपने प्रकाशन के पूर्व से ही विवादास्पद रही. अंग्रेजी में हिंदी की जरूरत क्यों पड़ी थी ? हिंदी साहित्य क्या एक पिछड़ा साहित्य है जो इसे अंग्रेजी के माध्यम से आगे बढ़ाने की जरूरत हो?
‘हिंदी’ को लेकर बहुत विवाद हुए हैं. मगर विवाद का क्या है, विवाद तो चलते रहते हैं. हम चाहे न चाहें, अगर हम अन्तर्राष्ट्रीय जगत में दाखिला लेना चाहते हैं तो उसकी मुख्य भाषा अंग्रेजी है. ऐसा बहुत-सा काम विदेशों में रहा है जिसकी जानकारी हम लोगों को नहीं है. ऐसा मंच नहीं हैं, जिसमें वे अपनी जानकारी को आपस में बांट सकें. हिंदी साहित्य विश्व के श्रेष्ठतम साहित्यों में से एक है, इसे हम अनुवाद के जरिए भी साबित कर सकते हैं. हिंदी साहित्य इस समय संसार के सबसे सशक्ततम साहित्यों में से एक है. मुझे इसमें कोई पिछड़ापन नजर नहीं आता.
हिंदी एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है. इसको आप किस रूप में लेते हैं?
मेरा मानना है कि हिंदी में जो साहित्य है वह संसार के उत्कृष्टतम साहित्यों में है. इसमें जो बौद्धिक और वैज्ञानिक ढंग की तैयारी है उससे भी इसे अन्य अन्तर्राष्ट्रीय भाषाओं के समक्ष रखा जा सकता है. यह इस अर्थ में भी अन्तर्राष्ट्रीय है कि यह फिजी, मारिशस, सूरीनाम आदि देशों में बोली जाती है. लेकिन हिंदी की भारी समस्या यह है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय कैसे हो जबकि उसे राष्ट्रीय होने में ही दिक्कत आ रही है. जिसे घर में इज्जत नहीं दी जा रही हो उसे चौक-बाजार में लोग पूजा करें, कैसे सोचा जा सकता है?
हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय बनाने में यह विश्वविद्यालय कैसे काम आ सकते हैं?
जहां तक हिंदी के राष्ट्रीय होने का सवाल है उसका राजनीतिक और सामाजिक हल हमने नहीं निकाला है. यह कोई विश्वविद्यालय नहीं कर सकता. परंतु हिंदी में जो आधुनिकता है उसमें ओजस्विता, उदग्रता और स्वप्न शीलता आ सके और इसके लिए जो बौद्धिक तैयारी होनी चाहिए उसके लिए युवा लोगों को तैयार किया जा सकता है. यह जरूर अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की आकांक्षा का लक्ष्य हो सकता है.
हिंदी साहित्य के संबंध में आपकी राय क्या है? आपके होने में इसकी क्या भूमिका है?
हिंदी साहित्य हिंदी समाज में भले ही वह स्थिति न बना पाया हो परंतु मैं मानता रहा हूं कि हिंदी साहित्य इस समय संसार के सबसे सशक्ततम साहित्यों में से है. मुझे इसमें कोई पिछड़ापन नहीं नजर आता है. हिंदी साहित्य पिछड़ा नहीं है हिन्दी समाज पिछड़ा है साहित्य के मुकाबले. एक मनुष्य के रूप में मैं अपनी पहचान हिंदी साहित्य के कारण ही मानता हूं अगर हिंदी साहित्य न हो तो हम न होते. मेरे ‘विजन’ में हिंदी साहित्य की बड़ी भूमिका रही हैं. मेरे दिमाग में इस बात को लेकर कोई संशय नहीं रहा कि मुझे हिन्दी लेखक बनना है. तेरह बरस की उम्र में ही मैंने यह तय कर लिया था. बाकी सब चीजें साथ-साथ होती रहीं. भारतीय प्रशासनिक सेवा में आ गया. मगर इस मार्ग से हटने या डिगने का कभी कोईप्रलोभन नहीं हुआ.
