बेटी रचना यादव से संगीता की बातचीत पर आधारित

रचना यादव हिन्दी के सर्वाधिक चर्चित और विवादास्पद लेखक राजेन्द्र यादव और मशहूर कथालेखिका मन्नू भंडारी की बेटी है. रचना ने एडवरटाइजिंग में मास कम्यूनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. फिर एडवरटाइजिंग एजेंसी में नौ साल तक नौकरी की. इन्होंने अपनी डिजाइनिंग की हॉबी को पूरा किया.  पिछले तीन साल से रचना कथक सीख रही हैं. रचना की दिलचस्पी साहित्य से अलग फिजिकल एक्टिविटीज में ज्यादा है. वे कहती हैं, ‘पापा की किताबें तो मैंने बहुत देर से यानी अभी कुछ दिनों पहले पढ़ी. मेरा उनसे डे टू डे डायलॉग रहा ही नहीं. इतना स्ट्रांग डे टू डे कम्यूनिकेशन नहीं था जिससे कि इमोशन का कोई एक्सप्रेशन हो पाता.’ उनके कई व्यक्तित्व हैं जिनमें एक इमोशनल पिता भी है…

वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव. जबरदस्त ठहाके, हर नए व्यक्ति से नए उत्साह से मिलना, युवक-युवतियों में छिपे साहित्य के बीज को ढूंढना और अपने काले चश्मे से सामने बैठे व्यक्ति को उसके आर-पार देख लेने की कोशिश करना.  ‘हंस’ के दफ्तर में कभी लाल, कभी पीले तो कभी हरे यानी युवा रंगों में रंगे बुश्शर्ट में शौकीन मिजाज यादव को हर वक्त नौजवानों वाले उत्साह में देखा जा सकता है.

वे एकसाथ दो व्यक्तित्वों को जीते हैं. लोगों को नजर आने वाला उनका रूप है-जिंदादिल, उन्मुक्त ठहाके, हमेशा लोगों की मदद को तत्पर, रंग-बिरंगे कपड़े के साथ जोश में भरे हुए मस्त राजेन्द्र यादव. गोष्ठियों में जब वे गंभीर साहित्यिक बातें करते हैं तो उनका तीसरा ही रूप उभर कर सामने आता है. तब वे अपने वजनी तर्कों से अपने व्यक्तित्व के हाथी रूप का परिचय देते लगते हैं.

जबकि उनका एक रूप कुछ ऐसा भी है जिसपर उन्होंने अपना काला चश्मा चढ़ा रखा है. जिससे वे स्वयं तो सामने वाले को देख सकते हैं पर सामने वाले को सिर्फ अंधेरा ही दिखता है. यह अंधेरा तब और रहस्यमय हो जाता है जब उनके दाहिने हाथ की बीच की ऊंगलियों में फंसे पाइप उनके होठ में जा लगते हैं. और गोल-गोल धुंए के छल्ले अंधेरे से मिलकर रहस्यों को और गहरा करते हैं. उनके भीतर बैठे व्यक्ति को स्पष्ट नहीं होने देते. उसी धुंध में बड़ी आसानी से वे अपने अकेलेपन, अपनी तकलीफ को ढक लेते हैं. उनके भीतर क्या चलता रहता है, क्या चाहते हैं वे… क्या उनकी बेटी समझ पाती है, कैसे देखती है एक बेटी अपने इमोशनल पिता को….

Rajendra Yadav, Mannu Bhandari and Rachna Yadav

राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी और रचना

रचना कहती है – पापा एकदम फोकस्ड हैं अपने राइटिंग को लेकर, बाकी सब उसके बाद आते हैं. जब मैं उनके बारे में सोचती हूँ तो मेरे दिमाग में पहला ख्याल आता है राइटर. फिर याद आता है कि अच्छा वो मेरे पापा भी हैं. इसका मतलब ये नहीं है कि मैं भूल जाती हूं.  पर इमीडिएटली जो एक छवि उभरती है, वो है राजेन्द्र यादव – राइटर.  राइटर, जो मेरे पापा हैं, वो बहुत-फोकस्ड रहे हैं अपने राइटिंग को लेकर. वे कभी कनवेंशनल फादर नहीं रहे. कनवेंशनल ब्रदर नहीं रहे. वे अपनी ही दुनिया में रहते थे जबकि मम्मी ही उनके भाई बहनों के साथ ज्यादा मतलब रखती थीं. इसका मतलब ये नहीं कि उनके अंदर फीलिंग नहीं थी उनलोगों के प्रति या मेरे लिये. पर उस फीलिंग को एक्सप्रेस उन्होंने कभी किया ही नहीं. क्योंकि उनका सारा एक्सप्रेशन राइटिंग में था. तो इस तरह वे इमोशनल लेवल पर बहुत कम्यूनिकेटिव नहीं रहे हैं हमलोगों के साथ. पापा लेखक पहले हैं, परिवार उनके लिए बाद में आता है. मम्मी के लिए परिवार पहले है, लेखन बाद में.

उनका मेरे साथ कुछ इस तरह का संबंध था. बचपन में वे खेलते बहुत थे मेरे साथ. जब मैं छोटी थी. मुझे हवा में उछालना, ताश खेलना और भी बहुत सारे खेल. एक मस्ती के लेवल पर तो उनसे बहुत जमता था. लेकिन अगर मुझे कोई बहुत इमोनशल बात करनी है तो ऐसा डायलॉग नहीं था हमारे बीच. और जब मैं स्कूल कॉलेज जाने लगी. बाहर निकलना होने लगा तब मेरा पापा के साथ वो खेलना भी खत्म हो गया. एक पन्द्रह साल की लड़की के साथ मस्ती तो नहीं करते हैं न. उस समय तक सोचने और रहने का तरीका अलग हो जाता है.

तो उस वक्त तक काफी गैप आ गया. उनसे बातचीत फंक्शनल लेबल पर रह गया और मम्मी के थ्रू रह गया. पर मुझे याद है जब स्कूल में मैं हेडगर्ल बनी थी तो स्पीच तैयार करना, डिबेट की तैयारी करना  ऐसी चीजें मैं उनके साथ बैठकर डिसकस किया करती थी.

हमारे घर में सिर्फ किताबें ही किताबें होती थी. सारे दिन लोग भी ऐसे ही आते थे. हर समय पढ़ने-लिखने जैसा ही माहौल था. तो मुझे पढ़ने से ऐसा एंटीरियेक्शन हुआ कि मैं बहुत पढ़ती नहीं थी. मैं लिखती नहीं हूँ. मेरा क्रिऐटिव आऊटलेट पूरी तरह अलग है.

मैं फिजिकल एक्टिविटीज में ज्यादा रूचि लेने लगी. स्पोर्ट्‌स में बहुत रूचि थी. अब डांस करती हूँ. इन्टीटियर्स डिंजाइजिंग और पापा की किताबें तो मैंने बहुत देर से यानी अभी कुछ दिनों पहले पढ़ी. मम्मी की तो पहले भी पढ़ी हूं. तो पढ़ने-लिखने वाली बातें पापा से डिसकस करने का सवाल ही नहीं था.  पापा मम्मी की किताब पढ़कर उसपर डिसकस कर रहे हैं, एनालाइज कर रहे है, ऐसा कभी था ही नहीं. अब तो फिर भी उनसे मिलती हूं तो पॉलिटिक्स पर बातें होती हैं.

स्कूल और कॉलेज में मेरी पूरी दुनिया ही दूसरी ही थी. उसके बाद एडवरटाइजिंग में चली गई. वो तो कमप्लीटली अलग है.  तो इस तरह मेरा उनसे डे टू डे डायलॉग रहा ही नहीं. इतना स्ट्रांग डे टू डे कम्यूनिकेशन नहीं था जिससे कि इमोशन का कोई एक्सप्रेशन हो पाता.

अब चूंकि हमलोग दूर-दूर रहते हैं तो एक दूसरे की परवाह ज्यादा होती है. अब कोई महत्वपूर्ण डिसीजन लेना होता है पापा को, तो वे बात करते हैं. हमारे बीच की इमोशनल बाउंडिग को वो अब रियलाइज करते हैं. जो उस समय हमने रियलाइज नहीं किया उसे अब रियलाइज कर रही हूँ कि कितना जुड़ाव है पापा को मुझसे और मुझे पापा से.

क्योंकि शुरू में वो बहुत एक्सप्रेस नहीं कर पाते थे. तब उनको अपनी किताबें, गैदरिंग… वो सब ज्यादा लगा रहता था.  इसका मतलब ये नहीं था कि हमलोगों के बीच बातचीत नहीं चल रही है. नार्मल बातचीत चलती थी, घर में जैसे रहते हैं पर मैं अपने दिल की बात उनसे कह रही हूंँ, इमोशनल बात कर रही हूँ, उस तरह का डायलॉग नहीं था पापा के साथ जैसा मम्मी के साथ था. मम्मी के साथ तो मैं सारे दिन उनका सिर खाती रहती थी.

क्योंकि मेरे और भाई-बहन नहीं थे तो मेरे दोस्त बहुत जरूरी थे मेरे लिए. जैसे जिनके भाई-बहन होते हैं वे तो घर में ही बिजी रह जाते हैं. मेरे स्कूल वाले दोस्त ही आज तक दोस्त बने हुए हैं.  तो वो मेरी अगल ही दुनिया थी.  जिसमें मैं इतना रम गई थी कि…

क्रमश: